12 September 2012

कभी कभी चौ-राहेपे नहि चाहनेसे,चातक

कभी      कभी     चौ-राहेपे       नहि      चाहनेसे ,
कैसे    कैसे    मुकामपे   लोग    मिल   जाते    है .


भूली      हुई    गुजरी    यादें     जहनमें    फिरसे ,
धड़कते    उल्फतके   अरमान   जतायें  जाते   है .


कभी   हमने   मुश्किलसे  संभलके  पाँव  रखे  थे ,
कयू    हमें    चलते    चलते     गिराए    जाते   है


लोग   अपने  युही   रहगुजरसे     चलते     चलते ,
क्यू   जलते    चिराग को    हवाँ    दिए   जाते   है


हम   आज  मुसीबतसे  ईस   मोद्पे   आके    रुके ,
रहगुजरसे   गुजरते    रुसवाई    किये   जाते    है


एक  बादल  है हम जिसका कोई साया नहीं होता ,
"चातक" वो बेरुखी से दिलपे दस्तक दिए जाते है .

चातक


1 comment:

  1. priya jain liked chatak Dev.'s blog post कभी कभी चौ-राहेपे नहि चाहनेसे,चातक,.
    6 hours ago

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