17 July 2013

कहा फिकर है आग धुआ की ,भीतर रहेता है वो,चातक


कहाँ   फिकर  है  आग  घूंआ  की , भीतर  रहेता  है  वो ,
ढूढ़ता  फिरता रहेता हूँ  कहाँ  कहाँ  , भीतर रहेता है वो  .


कभी ख्वाबो  में  आ  जाए  खुद ,यक़ीनन शब ही  सही ,
जियादा जानता है  मेरेसे  मुजको  भीतर  रहेता  है  वो



में  उसको सजदें  में  दस्ते -दुआ  उठाके  मांगता  नही ,
सांसो की रवानी  में  हर लम्हा सदा ,भीतर रहेता है वो


वो   मन्दिर  मस्जिद  गुरुदॢार  में  जाता    कभी   नहीं ,
आजकल   पयेगामे   अजूबा  करके ,भीतर रहेता है वो


शौके -सफर   का   सलीका   खुद      सांसो  में   बसाले ,
ये अश्क ,दर्द आहे बेताबिया बनकर ,भीतर रहेता है वो
चातक

शब -रात
दस्ते -दुआ -दुआ का हाथ
लम्हा -प्रतिष्ण   
अजूबा -अनोखी चीज
शौके-सफर -शफर की इच्छा
सलीका -विवेक -तजीब
        

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