27 November 2019

घनासा हैं अँधेरा और ज्यादा तेज हवा भी ,मुकुल दवे 'चातक '

घनासा   हैं  अँधेरा   और   ज्यादा   तेज हवा  भी
पकड़  ले  हाथ  अबभी  हम  जलाऐंगे  दिया   भी

छूटे   साथी   यहाँ   हमें   साजिश  भी याद भी  हैं
जमानेमें   और  कुछ  सोच  नफरतके  सिवा  भी

टुकड़ा  हर  काचका  भी  आईना सा  लगता ही हैं
अजीब कमबख्त है मुखौटे के अंदाजका नशा भी

बड़ी   मुश्किलसे    पत्थर    टूटता   है   यहाँ   भी
हमारे   ख्बाब   टूटा   कोई   पत्थर  सा  चला  भी

चराग जलता अभी रह जाते है बुझाने बाद दोस्त
भुलानेके  बाद  आते  है याद जब होती है सबा भी

सबा -सुबह
मुकुल दवे 'चातक '

9 November 2019

इतने खोकर मुझमें रहा न करो ,मुकुल दवे 'चातक '

इतने  खोकर  मुझमें  रहा न करो
बेरूखीमें   जुदा   किया   न   करो

ख्वाब   हैं  स्वप्नं  बुनने  के  लिए
सोचके  यूँ   मिटा  दिया   न  करो

अपने हुस्ने बयाँका  लिहाज  करो
यार  सबको  बना  लिया   न  करो

इतने ख़ामोशी से यूँ तबाह न करो
यह जख्म से गिला  किया न करो

तेरे  रुखसे  हर्फ़की  बेरुखी  न गई
गमकी  हिकायतें  किया   न  करो

हर्फ़ -शब्द // हिकायतें-कहानी
मुकुल दवे  'चातक '