9 November 2019

इतने खोकर मुझमें रहा न करो ,मुकुल दवे 'चातक '

इतने  खोकर  मुझमें  रहा न करो
बेरूखीमें   जुदा   किया   न   करो

ख्वाब   हैं  स्वप्नं  बुनने  के  लिए
सोचके  यूँ   मिटा  दिया   न  करो

अपने हुस्ने बयाँका  लिहाज  करो
यार  सबको  बना  लिया   न  करो

इतने ख़ामोशी से यूँ तबाह न करो
यह जख्म से गिला  किया न करो

तेरे  रुखसे  हर्फ़की  बेरुखी  न गई
गमकी  हिकायतें  किया   न  करो

हर्फ़ -शब्द // हिकायतें-कहानी
मुकुल दवे  'चातक '

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