31 December 2019

जानता नहीं चाहत मेरी इबादत है ,यूँ मिटा न दे ,मुकुल दवे 'चातक '

जानता नहीं चाहत मेरी इबादत है , यूँ  मिटा न दे
पाक  नजरोका  यही  सिलसिला  है,  यूँ  हवा न दे

कोई भी  फूल  लाख  करीब  हो उसको  छुआ नहीं
फूल  जैसे  फिरभी  सजदे जख्म है, यूँ सजा  न दे

मैं  तन्हा  कब  हुआ  यही तुम्हारा ही  फैसला  था
कभी छलक पड़ती यूँ ही आँखे, आंसू यूँ गिरा न दे

ये  खुदाकी  देन  अजीब  है  नाम उसका नसीब है
ये  नसीब  फिरभी  चराग  है , हाथ  यूँ  जला न दे

कुछ भी  सरे  राह  कहा नहीं आजतक कभी इन्हें
जिसे मैं ने चाहा वो मिला नहीं कोई यूँ सबब न दे
मुकुल दवे 'चातक '

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