31 December 2019

जानता नहीं चाहत मेरी इबादत है ,यूँ मिटा न दे ,मुकुल दवे 'चातक '

जानता नहीं चाहत मेरी इबादत है , यूँ  मिटा न दे
पाक  नजरोका  यही  सिलसिला  है,  यूँ  हवा न दे

कोई भी  फूल  लाख  करीब  हो उसको  छुआ नहीं
फूल  जैसे  फिरभी  सजदे जख्म है, यूँ सजा  न दे

मैं  तन्हा  कब  हुआ  यही तुम्हारा ही  फैसला  था
कभी छलक पड़ती यूँ ही आँखे, आंसू यूँ गिरा न दे

ये  खुदाकी  देन  अजीब  है  नाम उसका नसीब है
ये  नसीब  फिरभी  चराग  है , हाथ  यूँ  जला न दे

कुछ भी  सरे  राह  कहा नहीं आजतक कभी इन्हें
जिसे मैं ने चाहा वो मिला नहीं कोई यूँ सबब न दे
मुकुल दवे 'चातक '
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23 December 2019

ये शहर कैसा है हर इन्सान तन्हा दिखाई दे ,मुकुल दवे 'चातक '

ये   शहर   कैसा   है   हर  इन्सान   तन्हा  दिखाई  दे
बस  सिर्फ  जिस्म  है  हर  इन्सान जिन्दा दिखाई  दे

हर  यहाँ दिल जलता है, हर जिक्र की आवाज सुनी है
आसपास  धुआँ नजर  आए , न शोला अब दिखाई दे

इतना   दिन  धूंधला ,  हर  चेहरा  फिर  अजनबी   है
हर  किताबमें  दिलका  ही  हर पन्ना कोरा दिखाई दे

ये   कहाँ   पहुँची   नये  अन्दाज  लेके  जिन्दगी मेरी
जख्म   मेरा   इस   सलीक़ेसे  जला  हुआ दिखाई  दे

कोईभी  शख्स  यहाँ  भी  परखनेसे भी परखता नहीं
ये  किसी  भी  आइनमें  यूँ   अजब  बैठा  दिखाई  दे

मुकुल दवे 'चातक '

4 December 2019

हादसा इक हुआ है मेरी बन्दगीके साथ ,मुकुल दवे 'चातक '

हादसा    इक    हुआ   है   मेरी   बन्दगीके   साथ
जिन्दगीमे सब कुछ लूटा दिया दिल्लगी के साथ

में  क्यों  किसीके  गिले  शिकवे  करूँ  हर   कदम
इन्साफमे     मजबूरियाँ    है     आदमीके    साथ

हो   गया  महसूस   किसीने   उछाला  है  सिक्का
मुझे  मिला  है यह  सदा  वो  मुफ़लिसी  के  साथ 

दूरियाँ   मेरे  दरमियाँ   उसकी  है  यहभी  सच  है
हमसफ़र   हरकदम   रहा  मेरी  बेबसी  के   साथ

हाल  सुनाता  है  हमारा  रो -रो  कर  दुनियासे वो
राजदारी  कैसी  है  यह  मेरी  शर्मिन्दगी के  साथ

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मुकुल दवे 'चातक '